Tuesday, October 6, 2009

सच का सामना
' सच का सामना ' कार्यक्रम से हमारा सभ्य हय्पोक्राईट संसार काफी आहत है। इसका विरोध दो स्तर पर प्रारंभ हो गया है - १) मीडिया के स्तर पर, २) राजनीतिक स्तर पर। गौरतलब है कि कार्यक्रम में शामिल होने वाले प्रतिभागी साहस पूर्वक सच का सामना कर रहे हैं। उनके स्तर पर विरोध के स्वर नही आ रहे हैं।
आख़िर प्रतिभागियों के द्वारा सहर्ष सच का सामना किया जा रहा है तो मीडिया और राजनीतिक स्तर पर विरोध के कारण kya हैं ? yah virodh २१वी सदी में शामिल मध्यकालीन मान्यताओं का है , शोषण और भ्रष्टाचार पर आधारित व्यवस्था का है । राजनीतिक स्तर पर पार्लियामेंट में तथा न्यायपालिका में विरोध दर्ज किए जा चुके हैं। यह विरोध दरअसल व्यवस्था तथा समाज ke नंगेपन और शोषण को बरक़रार रखने कि कोशिश है ।
विरोधियों द्वारा ' व्यक्तिगत सच ' की अवधारणा प्रसारित की जा रही है । सच दो प्रकार के होते हैं - सामाजिक और व्यक्तिगत । जिस सच का सरोकार निजता से ऊपर उठ कर समाज तक चला जाता है, वह सच व्यक्तिगत नही रह जाता , सामाजिक हो जाता है , जिसका प्रभाव पुरे समाज पर पड़ता है । जैसे हुसैन साहब से पूछे गए एक सवाल को देखिये - क्या आपकी नाजायज औलाद है ? क्या यह सवाल व्यक्तिगत है ? क्या इसके जरिये हम उस नाजायज संतान के मौलिक अधिकारों का हनन नही कर रहे हैं ? क्या उस संतान को सामाजिक स्थान पाने का हक नही । ऐसे बहुतेरे उदहारण मिलेंगे जो हमारे सभ्य समाज की बुराइयों से जुड़े हैं , जिनका खुलासा समाज के हित में है और इन्हे स्वीकार किया जाना चाहिए ।
अब सच का मनोवैज्ञानिक महत्व देखें । आज समाज की एक बड़ी आबादी डिप्रेशन से पीड़ित है डिप्रेशन के दो कारण होते - अपूरित इच्छाएं और सच को दबाना । मनोविज्ञान कहता है की यदि हम अपने आप को किसी से शेयर करें , समाज से शेयर करें तो डिप्रेशन से मुक्ति मिल जायेगी । उर्वशी ढोलकिया (कौमोलिका ) से एक सवाल पूछा गया था - क्या कम उम्र में गर्भवती हो जाने से कॉलेज से निकाल दिया गया था ? यह घटना उनके लिए डिप्रेशन का कारण बन सकती है । ऐसे बहुत सारे सवाल नामी हस्तियों की जिंदगियों से जुड़ी होती है ग्लैमर की हस्तियों की आत्महत्याएं (आम व्यक्ति की bhi) तोर्चेरेड जिंदगी इन छोटी मोटी गलतियों के नतीजे होते हैं । सच का सामना उन्हें इस डिप्रेशन से बाहर निकाल साकता है । उनके बच्चों में माँ - बाप को सम्मान दिला सकता है तथा उनके लिए मिसाल प्रस्तुत कर सकता है - ऐसे गलतियों से सबक लेने का । अतः इस तरह के सच पुरे समाज को उनकी कमजोरियों को दूर कर उन्हें गरिमा प्रदान कर सकते हैं ।
पुनर्जागरण कालीन मान्यताओं के अनुसार व्यक्ति को उसकी अच्छाइयों तथा बुराइयों के साथ स्वीकारा गया । इससे व्यक्ति को गरिमा प्राप्त हुई और आधुनिक मानव का जन्म हुआ और आज का मानव पुनार्जाग्रंकालीन मूल्यों की पहचान है । आज हम सच का सामना को नकार कर के निसंदेह मध्यकालीन मूल्यों को प्रस्सरित करने कोशिश कर रहे हैं ताकि हम आधुनिक युग में प्रवेश na कर सके । आज यूरोप और अमेरिका या चीन - जापान जैसे देशों में नाजायज संबंधों को लोग को स्वीकार करते रहे हैं , जिससे मानविए गरिमा का हनन नही होता बल्कि वृधि होती है । भारत में भी ऐसे करोडो संबध विधमान है , लेकिन उन्हें व्यक्तिगत बता कर समाज को कुंठा , निराशा , हताशा के संसार में धकेल दे रहे हैं ।
अब रहा सवाल की मीडिया और राजनीतिक स्तर पर इतना विरोध क्यों । इसका उत्तर ये है की आज न कल ये वर्ग भी सच का सामना के लिए धकेल दिए जा सकते हैं । यदि ये इनकार करते हैं तो इनकी भारी बदनामी होगी और यदि ये स्वीकार करते हैं तो बमुश्किल एक स्तर भी पार करना इनके लिए मुश्किल होगा। ये वर्ग सार्वजनिक जीवन से आते हैं । इनका सच व्यक्तिगत नही हो सकता । यदि इनके कुकृत्यों का प्रभाव पुरे देश तथा सामाज पर पड़ता है तो क्या इसे छिपाया जाना चाहिए या इन्हें समाज के सामने आना चाहिए ?
अतः कार्यक्रम का विरोध सच के स्तर पर नही किया जाना चाहिए । हाँ कार्यक्रम की कुछ कमजोरियां हैं जिन्हें दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए । जैसे '- polygram मशीन की विश्वसनीयता ; जिसे आमतोर पर न्यायालय द्बारा स्वीकार नही किया जाता ; किसी भी स्तर पर एक भी प्रश्न के ग़लत हो जाने पर इनाम की राशिः जीरो हो जाना आदि।
अंततः यह कहा जा सकता है की सच का सामना भारतीय सामाज के लिए एक अभिनव प्रयोग है। जिसमे मध्यकालीन मूल्यों को दूर कर भारत को २१ वी सदी की आधुनिकता से रूबरू कराने की झमता है । अतः यह प्रयास स्वागत योग्य है तथा निर्माता इसके लिए बधाई के पात्र हैं।